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ठहर सके जो लबों पे हमारे, हँसी के सिवा है मजाल किसकी

जुल्फे बांधा मत करो तुम,
हवायें नाराज़ रहती है

चुपचाप चले थे जिंदगी के सफर में, तुम पर नजर पड़ी और
गुमराह हो गए

तौबा…
तुम्हारी ये बातूनी आंखें…
मुझे कुछ बोलने ही नहीं देती..

बात तो तेरी सुनी ही नहीं मैंने ध्यान मेरा तेरे लबों पर था

शुक्र है ये दिल सिर्फ धड़कता है, अगर बोलता तो कयामत आ जाती

तुम जरा सी कम खूबसूरत होती
तो भी बहुत खूबसूरत होती

चूडिय़ां तो हमेशा से आम थी, साहब कहर तो कलाईयों ने बरपाया है

बहुत तारीफ करता था मैं उसकी बिंदी की, लफ्ज़ कम पड़ गए जब उसने झुमके पहने

अब अदरक इलायची की जरूरत कहां मुझे एक तेरा नाम लेते हैं.
और ये चाय महक जाती है